विश्लेषण: TMC टूट रही है — और हर बार सबसे पहले वोटर का भरोसा टूटता है
पार्टी टूटने की खबर टीवी पर ब्रेकिंग है, उस वोटर के लिए नहीं जो लाइन में लगकर वोट दे आया था। TMC की बगावत के बहाने — टूट किसकी हार है, और इसका असली जिम्मेदार कौन।

पार्टी टूटने की खबर टीवी पर एक ब्रेकिंग बैंड है। उस आदमी के लिए नहीं, जो दो साल पहले धूप में लाइन लगाकर वोट दे आया था। उसका नाम किसी पत्र में नहीं है। उसका भरोसा ज़रूर है — और आज वही भरोसा बँट रहा है।
तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अलग मान्यता माँगी है, नेता बताया गया है काकोली घोष दस्तीदार को। बस इतनी-सी खबर है। बाक़ी सब सवाल है।
पहला सवाल आप ख़ुद से पूछिए — पार्टी आख़िर टूटती क्यों है? विचारधारा से? नहीं। पार्टियाँ विचार पर कम, कुर्सी पर ज़्यादा टूटती हैं। जहाँ ऊपर से आदेश आता है और नीचे से सिर्फ़ ताली, वहाँ एक दिन ताली बजाने वाले हाथ पत्र लिख देते हैं।
यह किसी एक पार्टी का रोग नहीं। यह हमारी लगभग हर पार्टी का चरित्र है — जहाँ 'पार्टी' का मतलब एक चेहरा, एक परिवार, एक सुप्रीमो रह गया है। बाक़ी सब उस चेहरे की छाया हैं। और छाया कभी सवाल नहीं पूछती। जब तक पूछ न ले।
अब वो असली सवाल, जिससे सब बचते हैं — ज़िम्मेदार कौन?
जवाब एक नाम में नहीं, तीन परतों में है। पहली परत — वो नेतृत्व जिसने संगठन को संवाद नहीं, हुक्म पर चलाया; जहाँ वफ़ादारी की परिभाषा 'चुप रहना' कर दी गई। दूसरी परत — वो राजनीतिक मंडी, जहाँ सांसद के पाला बदलने को 'रणनीति' कहा जाता है और तोड़-फोड़ को 'जनादेश'। यह सवाल पुराना है, हर टूट के साथ लौटता है — क्या केंद्र की ताक़त और जाँच एजेंसियों का साया विपक्ष को कमज़ोर करने का औज़ार बनता है? सवाल असुविधाजनक है, इसीलिए ज़रूरी है। और तीसरी परत — वो व्यवस्था, जिसने वोटर को सिर्फ़ चुनाव वाले दिन का राजा बना रखा है। बाक़ी पाँच साल वह दर्शक है, और दर्शक से कोई हिसाब नहीं माँगता।
इस पूरे खेल में जीते कोई भी, हारता एक ही है — वही आदमी, जो लाइन में लगा था। जिन सांसदों को उसने एक झंडे के नीचे भेजा था, वे आज दूसरे ख़ेमे में हैं। तो उसके वोट का क्या? वह वादा किसके खाते में गया, जिस पर उसने मुहर लगाई थी?
और एक बात, जो शोर में दब जाती है — संघवाद। क्षेत्रीय दल इस देश की कई आवाज़ें हैं। जब ये दल भीतर से दरकते हैं या बाहर से तोड़े जाते हैं, तब किसी पार्टी का नहीं, राज्यों का गला बैठता है।
तो सवाल यह नहीं कि अगला नेता कौन। सवाल यह है कि क्या हमारी पार्टियाँ कभी अपने ही भीतर लोकतंत्र लाएँगी? जिस दिन कोई पार्टी अपने कार्यकर्ता और वोटर को सचमुच मालिक मानेगी, उस दिन ऐसे पत्र नहीं लिखे जाएँगे।
तब तक, हर टूट पर बस यही पूछते रहिए — फ़ायदा किसका, और भरोसा किसका टूटा। जवाब हर बार वही मिलेगा। इस पर सोचिए। सच में सोचिए।
(विश्लेषण/राय। तथ्य रिपोर्ट्स पर आधारित; राय लेखक की।)
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