असली पार्टी किसकी? दलबदल रोकने वाला क़ानून अब दलबदल का दरवाज़ा
शिवसेना (UBT) के छह सांसद दो-तिहाई का आँकड़ा छूकर शिंदे गुट में मिल गए — क़ानून ने रोका नहीं, रास्ता दिया। दलबदल विरोधी क़ानून की पोल खोलता विश्लेषण।

मान लीजिए, आपने एक दुकान से सालभर का चाय-कूपन ख़रीदा। नाम देखकर, स्वाद देखकर, भरोसा देखकर। और एक सुबह जाकर देखते हैं — दुकान वही है, बोर्ड वही है, पर अंदर बैठा आदमी बदल गया है। और वह कह रहा है कि अब यही 'असली' दुकान है।
आप क्या करेंगे? शिकायत किससे करेंगे?
भारत की राजनीति में मतदाता ठीक इसी दुकान के सामने खड़ा है।
हाल ही में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसद पाला बदलकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए। बताया गया कि ये छह, उद्धव के संसदीय दल के दो-तिहाई हिस्से के बराबर हैं। यही 'दो-तिहाई' वह जादुई संख्या है, जिसके बाद क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ता। उद्धव के पास लोकसभा में अब सिर्फ़ तीन सांसद बचे; शिंदे खेमा सात से तेरह का हो गया।
ग़ौर कीजिए — जिस क़ानून का नाम ही 'दलबदल विरोधी' है, उसी क़ानून के तहत यह दलबदल पूरी तरह वैध है।
इस पर सोचिए। सच में सोचिए।
**थोड़ा पीछे चलिए।** यह क़ानून आसमान से नहीं टपका। 1985 में, राजीव गांधी सरकार के दौर में, 52वें संविधान संशोधन के ज़रिए संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। मक़सद नेक था — 'आया राम, गया राम' वाली राजनीति पर लगाम। (यह मुहावरा भी असली है: 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार पाला बदला था। तब से हर पलटी मारने वाले नेता के पीछे यही जुमला चलता है।)
पर क़ानून में एक खिड़की छोड़ दी गई — किसी दल का एक-तिहाई हिस्सा टूटे, तो उसे 'विभाजन' मानकर छूट मिल जाती थी। यानी तोड़ने का लाइसेंस क़ानून में ही लिखा था। 2003 में, 91वें संशोधन से यह खिड़की बंद हुई — एक-तिहाई वाली छूट हटा दी गई। पर एक दरवाज़ा खुला रह गया: अगर दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में 'विलय' कर लें, तो कोई अयोग्यता नहीं।
यही दो-तिहाई वाला दरवाज़ा आज पूरी राजनीति की सबसे व्यस्त गली है।
**और यह सिर्फ़ महाराष्ट्र की कहानी नहीं।** याद कीजिए — कर्नाटक, 2019: दर्जनभर से ज़्यादा विधायकों के इस्तीफ़े, और सरकार पलट गई। मध्य प्रदेश, 2020: ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ क़रीब बाईस विधायक निकले, और कमलनाथ सरकार गिर गई। महाराष्ट्र, 2022: शिवसेना ख़ुद पहली बार टूटी, चालीस विधायक निकले, और मुख्यमंत्री बदल गया।
अलग-अलग राज्य, अलग-अलग पार्टियाँ, अलग-अलग साल। पर पटकथा एक ही — जनता ने जिसे चुना, प्रतिनिधि उसे छोड़कर उधर चला गया, जिधर सत्ता थी। और हर बार क़ानून किनारे खड़ा तमाशा देखता रहा। क्यों? क्योंकि क़ानून तोड़ा नहीं गया — क़ानून का इस्तेमाल किया गया।
**अब जवाबदेही की बात — गोल-गोल नहीं, सीधी।** दलबदल पर फ़ैसला कौन करता है? सदन का अध्यक्ष, यानी स्पीकर। और स्पीकर आमतौर पर किस दल से आता है? सत्ताधारी दल से। यानी जिसे फ़ैसला करना है, वह अक्सर उसी पक्ष का होता है जिसे फ़ैसले से फ़ायदा है।
नतीजा? अयोग्यता की याचिकाएँ सालों लटकी रहती हैं। कई बार तो जिस सदन का कार्यकाल ही ख़त्म हो जाता है, फ़ैसला तब तक नहीं आता। ख़ुद सुप्रीम कोर्ट एक से ज़्यादा बार कह चुका है कि स्पीकर को तय समय-सीमा में फ़ैसला देना चाहिए, और बेहतर हो कि यह अधिकार किसी स्वतंत्र संस्था के पास हो। पर सिफ़ारिशें फ़ाइलों में हैं, और पाला बदलने वाले सदन में।
**इस पूरे खेल में एक ही किरदार है, जिससे कोई नहीं पूछता — वह वोटर।** वह आदमी, जो चिलचिलाती धूप में लाइन में लगा, उँगली पर स्याही लगवाई, और एक चुनाव-चिन्ह के आगे बटन दबाया। उसने पार्टी को वोट दिया, चेहरे को वोट दिया, एक वादे को वोट दिया।
और कुछ महीनों बाद उसका चुना हुआ प्रतिनिधि किसी और खेमे में बैठा मिलता है — नए झंडे के साथ, पुरानी कुर्सी पर। उससे किसी ने नहीं पूछा। उसकी उँगली की स्याही अभी मिटी भी नहीं थी।
**साफ़ कहें तो — यह क़ानून अपने ही नाम को झुठला रहा है।** जो 'दलबदल विरोधी' है, वही दलबदल का सबसे भरोसेमंद रास्ता बन गया है। 'दो-तिहाई' अब सिद्धांत नहीं, सौदे की दर है।
इसे ठीक कौन करेगा? गेंद संसद के पाले में है — वही संसद, जिसके सदस्यों को इस दरवाज़े के खुले रहने में सुविधा है। यहीं असली विडंबना है: ताला उन्हीं के हाथ में है, जिन्हें दरवाज़ा खुला पसंद है।
तो अगली बार जब कोई नेता मंच से 'जनादेश' और 'लोकतंत्र' की दुहाई दे, एक सवाल याद रखिएगा — असली पार्टी किसकी? उसकी, जिसे आपने वोट दिया? या उसकी, जिसमें आपका वोट रातोंरात 'विलय' कर दिया गया?
जवाब मिले तो बताइएगा।
स्याही अब भी आपकी उँगली पर है।
(यह राय/विश्लेषण है। तथ्य सार्वजनिक अभिलेख और समाचार रिपोर्टों पर आधारित हैं।)
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