विश्लेषण: खाड़ी में जिनकी जान दांव पर, बड़ी ताक़तों की मेज़ पर उनकी कुर्सी कहाँ?
खाड़ी के तनाव में जिन जहाज़ों पर भारतीय सवार हैं, उनकी जान सबसे आगे दांव पर है। पर 'समझौतों' और 'सामरिक हितों' की बहस में मज़दूर और नाविक की बात कौन करता है? एक विश्लेषण।
बीस। यह सिर्फ़ एक संख्या नहीं — बीस भारतीय परिवारों की धड़कन है, जो खाड़ी से आती हर खबर के साथ ठहर जाती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक खाड़ी में हमले की चपेट में आए एक जहाज़ पर क़रीब बीस भारतीय सवार बताए गए हैं। और यह तो सिर्फ़ एक जहाज़ है — इस इलाक़े में लाखों भारतीय मज़दूर और नाविक रोज़ी कमाते हैं।
आँकड़े एक सीधा सवाल पूछते हैं। तेल, होर्मुज़, 'सामरिक हित', 'शानदार समझौता' — बहस इन्हीं भारी शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती है। पर जिनकी ज़िंदगी सीधे दांव पर है, उस मज़दूर का नाम इस पूरी बहस में कहीं नहीं आता।
युद्ध का फ़ैसला हमेशा ताक़तवर करते हैं, और कीमत हमेशा कमज़ोर चुकाते हैं। मिसाइल किसी जनरल के घर पर नहीं गिरती; वह उस जहाज़ पर गिरती है जहाँ कोई बिहार या यूपी का नौजवान महीनों बाद घर लौटने का सपना लिए खड़ा होता है।
किसके हिस्से क्या आया, यह देखिए। बड़ी ताक़तों के हिस्से सुर्खियाँ और सौदेबाज़ी की ताक़त; और प्रवासी मज़दूर के हिस्से — अनिश्चितता, बीमा के झगड़े, और एक फ़ोन कॉल का इंतज़ार।
असली सवाल यह नहीं कि होर्मुज़ खुलेगा या बंद। असली सवाल यह है कि जब-जब बड़ी ताक़तें खेलती हैं, हमारे मज़दूरों की सुरक्षा का इंतज़ाम पहले से क्यों नहीं होता? उनके लिए एक ठोस निकासी योजना, बीमा और राजनयिक कवच — यह दया नहीं, उनका हक़ है।
जिस दिन नीति के केंद्र में 'सामरिक हित' की जगह 'इंसानी जान' आएगी, उस दिन ऐसी हर खबर के साथ बीस परिवारों की धड़कन नहीं रुकेगी। तब तक यही पूछते रहिए — मेज़ पर उनकी कुर्सी कहाँ है?
(यह विश्लेषण/राय है; तथ्य रिपोर्ट्स पर आधारित, निष्कर्ष लेखक के।)
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